रमजान 2026: पहला रोजा आज, इबादत में रह ना जाए कोई कमी; जानिए सही तरीका और जरूरी नियम
Published on: 19 Feb 2026 | Author: Reepu Kumari
नई दिल्ली: रमजान का पवित्र महीना हर साल दिलों में नई उम्मीद और आध्यात्मिक ऊर्जा लेकर आता है. मस्जिदों में तरावीह की नमाजें शुरू हो गई हैं, बाजारों में खजूर और सेहरी की चीजों की रौनक छाई है, जबकि घरों में इफ्तार की तैयारियां जोरों पर हैं. भारत में चंद्र दर्शन के बाद आज पहला रोजा रखा जा रहा है. लेकिन कई लोग पूछते हैं कि असली रोजा क्या होता है? सिर्फ पेट खाली रखना काफी है या इसके पीछे गहरा मकसद है?
यह महीना रहमत, मगफिरत और नजात का है, जहां कुरआन का नुजूल हुआ था. रोजा इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है, जो इंसान को संयम सिखाता है और दूसरों के दर्द को महसूस करवाता है.
रोजे का सही समय और शुरुआत
रोजा फज्र की अजान से पहले सेहरी के साथ शुरू होता है और मगरिब पर इफ्तार के साथ खत्म. आज दिल्ली में सेहरी करीब 5:36 बजे तक और इफ्तार शाम 6:15 बजे के आसपास है. सेहरी में पौष्टिक और हल्का खाना लें ताकि दिनभर ताकत बनी रहे. इफ्तार खजूर और पानी से शुरू करना सुन्नत है. परिवार साथ बैठकर दुआ मांगता है, जो इस पल को और खास बना देता है. सही समय पर अमल करने से रोजा मजबूत होता है.
किन लोगों पर रोजा फर्ज है और छूट
हर बालिग, होश में और सेहतमंद मुसलमान पर रमजान के रोजे फर्ज हैं. बीमार, सफर में, गर्भवती या दूध पिलाने वाली महिलाएं, मासिक धर्म वाली महिलाएं छूट पा सकती हैं. बाद में वे कजा कर लें. यह छूट अल्लाह की रहमत है ताकि कोई मुश्किल में न पड़े. रोजा रखना सिर्फ फर्ज नहीं, बल्कि खुद को बेहतर बनाने का मौका भी है.
क्या चीजें रोजा तोड़ देती हैं
जानबूझकर खाना-पीना, धूम्रपान या वैवाहिक संबंध रोजा तोड़ देते हैं और कफ्फारा लग सकता है. लेकिन झूठ, गुस्सा या किसी को ठेस पहुंचाना भी रोजे की रूह को नुकसान पहुंचाता है. बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि जुबान, आंख और दिल का भी रोजा रखो. सच्चा रोजा वही है जो सिर्फ पेट नहीं, पूरे वजूद को पाक करता है.
रोजे की चुनौतियां और फायदे
पहले दिन थोड़ी मुश्किल लगती है, खासकर अगर दिन लंबे हों. लेकिन जल्दी ही शरीर और मन आदत डाल लेते हैं. कई लोग कहते हैं कि रोजे से सुकून मिलता है, इरादा मजबूत होता है. कामकाजी लोग भी इसे मैनेज कर लेते हैं. रोजा भूख के जरिए गरीबों का दर्द समझने की तालीम देता है और इंसान को करुणामय बनाता है.
सामाजिक एकता और सदका का महत्व
रमजान में सदका और जकात देने की परंपरा जोर-शोर से चलती है. मस्जिदों में सामूहिक इफ्तार होते हैं जहां अमीर-गरीब साथ बैठते हैं. यह बराबरी का खूबसूरत नजारा पेश करता है. रोजा सिर्फ व्यक्तिगत इबादत नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और मदद का जरिया भी है. इस महीने में संयम और दान से इंसानियत की मिसाल कायम होती है.
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