बांग्लादेश में हिंदुओं की सिलसिलेवार हत्याएं, क्या बढ़ रहा है संगठित उत्पीड़न?
Published on: 16 Feb 2026 | Author: Kanhaiya Kumar Jha
नई दिल्ली: दिसंबर 2025 में बांग्लादेश में हिंदू पुरुषों की हत्याएं कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं थीं, बल्कि हिंदू अल्पसंख्यकों के लंबे समय से चले आ रहे उत्पीड़न के एक और अध्याय की तरह सामने आईं. एक महीने से भी कम समय में कम से कम 12 हिंदुओं की मौत हुई, जिनमें कई मामलों में भीड़ हिंसा और कानून से बाहर जाकर सजा देने जैसी घटनाएं शामिल थीं. इससे साफ है कि राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक कट्टरता और प्रशासनिक कमजोरी मिलकर अल्पसंख्यकों को बेहद असुरक्षित बना देती हैं.
मारे गए लोगों में दीपू चंद्र दास, अमृत मंडल (सम्राट), दिलीप बर्मन, प्रांतोष कर्मोकार, उत्पल सरकार, जोगेश चंद्र रॉय, सुबोर्ना रॉय, शांतो दास, रिपोन कुमार सरकार, प्रताप चंद्र, स्वाधीन चंद्र और पोलाश चंद्र शामिल हैं. प्रशासन ने हर मामले को अलग-अलग आपराधिक घटना बताया, लेकिन घटनाओं का क्रम यह संकेत देता है कि यह संयोग नहीं, बल्कि एक पैटर्न है.
कट्टरता, राजनीति और अल्पसंख्यकों की बढ़ती असुरक्षा
बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा समाज और राजनीति में जड़ जमा चुकी कट्टर सोच की ओर इशारा करती है. सांप्रदायिक बयानबाजी और लगातार बढ़ती भारत-विरोधी भाषा ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है. सार्वजनिक विमर्श में हिंदुओं के खिलाफ आक्रामकता को कई बार वैचारिक विरोध के रूप में पेश किया जाता है, जिससे राजनीति और सांप्रदायिक डराने-धमकाने की रेखा धुंधली हो जाती है.
परिवर्तन और छात्र आंदोलनों की भाषा का इस्तेमाल भी कई बार ऐसे एजेंडों को आगे बढ़ाने के लिए किया गया, जिनसे कट्टर तत्वों को संरक्षण मिला. इस माहौल में देश के अंदर रहने वाले हिंदू समुदाय को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ा.
‘ईशनिंदा’ के आरोप और भीड़ का न्याय
दिसंबर की कई हत्याओं में ईशनिंदा के आरोप सामने आए. बिना ठोस सबूत या औपचारिक शिकायत के लगाए गए ऐसे आरोप अक्सर भीड़ को उकसाने का कारण बने. कुछ मामलों में पीड़ितों पर आपराधिक गतिविधियों का आरोप लगाया गया, लेकिन लगभग हर घटना में कानूनी प्रक्रिया की जगह भीड़ ने फैसला सुनाया.
मयमनसिंह जिले में एक परिधान फैक्ट्री में काम करने वाले दीपू चंद्र दास पर इस्लाम के खिलाफ कथित टिप्पणी का आरोप लगाया गया. भीड़ ने उन्हें पीटा, पेड़ से बांधा, फांसी दी और आग के हवाले कर दिया. बाद में जांच में ईशनिंदा का कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला.
इसी तरह राजबाड़ी जिले में अमृत मंडल की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. प्रशासन ने उनके कथित आपराधिक अतीत का हवाला देकर सांप्रदायिक कोण से इनकार किया. लेकिन सवाल यह है कि अगर आरोप थे भी, तो कानून के बजाय भीड़ ने सजा क्यों दी?
राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर प्रशासन
ये घटनाएं उस समय हुईं जब देश के कई हिस्सों में राजनीतिक अस्थिरता और विरोध प्रदर्शन चल रहे थे. ऐसे हालात में कानून-व्यवस्था पर दबाव बढ़ा और अल्पसंख्यक समुदाय फिर से निशाने पर आ गया. पिछले अनुभव भी बताते हैं कि अशांति के दौर में हिंदू समुदाय अक्सर अधिक असुरक्षित हो जाता है.
कट्टरपंथी संगठनों और उनसे जुड़े छात्र समूहों ने धार्मिक पहचान को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है. चुनावी माहौल में पहचान आधारित राजनीति ने समाज को और ध्रुवीकृत किया.
सरकार की प्रतिक्रिया और भरोसे का संकट
अंतरिम सरकार ने हत्याओं की निंदा की और भीड़ हिंसा का विरोध दोहराया. कुछ मामलों में गिरफ्तारियां भी हुईं. लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय के लिए भरोसा सिर्फ बयानबाजी से नहीं बनता, बल्कि समय रहते रोकथाम, त्वरित कार्रवाई और दोषियों को सजा मिलने से बनता है.
बार-बार एक जैसा पैटर्न सामने आना, आरोप, भीड़, हत्या और फिर आश्वासन, यह दर्शाता है कि समस्या गहरी है. जब तक हर आरोप की जांच कानूनी प्रक्रिया से नहीं होगी और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा राजनीतिक परिस्थितियों से ऊपर रखकर सुनिश्चित नहीं की जाएगी, तब तक यह सिलसिला थमना मुश्किल है.